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दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की पूजा, सरलता और ईमानदारी का दिया संदेश

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काकादेव के चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा और सामूहिक पूजा के बाद हुआ प्रवचन

डॉ. कोमल चंद्र जैन बोले- विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता से जीवन में आती है शांति

अरविन्द पाण्डेय 

कानपुर। काकादेव स्थित चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की पूजा-अर्चना की गई। पर्व की शुरुआत भगवान के अभिषेक के साथ हुई। इसके बाद शांतिधारा और सामूहिक पूजा का आयोजन किया गया। शाम को श्रद्धालुओं ने महाआरती में हिस्सा लिया।

शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री पी. के. जैन, संजय जैन, विकासदेव, अनुज जैन, शाश्वत जैन, ओम संजय जैन और बृजवाला परिवार को प्राप्त हुआ।


आर्जव धर्म सिखाता है विचार और कर्म में एकरूपता

पूजा-अर्चना के बाद आचार्य विद्यासागर सुधासागर जैन शोधपीठ, छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में प्राकृत का अध्यापन करा रहे डॉ. कोमल चंद्र जैन ने धर्मसभा को संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म व्यक्ति को स्वयं के साथ ईमानदार रहने का पाठ पढ़ाता है। जब व्यक्ति के विचार, भावनाएं और कर्म एकरूप होते हैं, तभी जीवन में शांति और स्थायित्व प्राप्त किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि आर्जव धर्म का संदेश है कि व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही कहे और जो कहे, उसे अपने आचरण में उतारे। इसके साथ झूठ, पाखंड और दिखावे का त्याग कर जीवन में सादगी, सच्चाई और पारदर्शिता अपनाने पर जोर दिया गया।

डॉ. कोमल चंद्र जैन ने बताया कि ‘आर्जव’ शब्द का अर्थ सीधापन, सुगमता, सरलता, स्पष्टवादिता और ईमानदारी है। व्यवहार में कुटिलता का अभाव और सरलता भी आर्जव धर्म के प्रमुख भाव माने जाते हैं।

महाआरती में शामिल हुए साधर्मी

संध्या के समय मंदिर में महाआरती का आयोजन किया गया। धर्मसभा में नरेश जैन, जगदीश जैन, चौधरी पीके जैन, अनुराग जैन, रेणु जैन, सरोज जैन, ममता जैन समेत अनेक साधर्मी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना और धर्मसभा में सहभागिता की।

 

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